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दक्षिण गुजरात का औद्योगिक शहर वापी ई-वाहनों का मैन्युफैक्चरिंग केंद्र बना

केंद्र और राज्य सरकार ने 30 हजार इलेक्ट्रिक वाहनों को बनाने की अनुमति दी:-
वापी में बने ई-वाहनों के जरिए मेक इन इंडिया का नारा देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों तक पहुंचा:-
संकलन :- जिग्नेश सोलंकी
श्यामजी मिश्रा 
स्टार मीडिया न्यूज, 
 वापी। बढ़ते वायु और ध्वनि प्रदूषण को रोककर पर्यावरण को संरक्षित करने में सबसे बेहतर माने जाने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए जहां केंद्र और राज्य सरकारें प्रयास कर रही हैं, वहीं एक इंजीनियर युवक ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में स्टार्टअप शुरू किया है। वर्ष 2019 में दक्षिण गुजरात के वलसाड जिले के औद्योगिक शहर वापी में मोदी के “स्वच्छ भारत, हरित भारत” के सपने को साकार करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का निर्माण शुरू किया है । चार वर्ष की अल्प अवधि और कोरोना काल की कठिन परिस्थितियों में भी ई-वाहनों का उत्पादन बिना हार माने जारी रहा। अब तक न केवल गुजरात में बल्कि देश की सीमा पार अफ्रीका देश में भी “मेक इन इंडिया” का नारा बुलंद हो चुका है।
एक जर्मनी कंपनी में  साढ़े तीन लाख रुपये की सैलरी वाली नौकरी छोड़ने वाले मैकेनिकल इंजीनियर मनीष विजयभाई पाटिल ने साल 2015 में सोलार और प्रदूषण मुक्त मशीनें बनाकर पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अपना काम शुरू किया। परंतु 2019 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रभाई मोदी के मंत्र, “स्वच्छ भारत, हरित भारत” से प्रेरित होकर ई- वाहनों का उत्पादन करने के लिए उन्होंने 50 लाख रुपए की पूंजी निवेश कर स्टार्टअप की शुरुआत की और बालीठा में इलेक्ट्रो इको मोबिलिटी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना की। आज वे प्रति वर्ष 7 करोड़ रुपये का टर्नओवर करने के साथ ही इलेक्ट्रिकल, मॉड्यूलर, इंजीनियर, वेल्डर, फिटर और अकाउंटेंट समेत 30 से अधिक डिग्रीधारी युवक-युवतियों को रोजगार भी दे रहे हैं। उनके स्टार्टअप की सराहना की गई और वापी के इंजीनियर्स एसोसिएशन द्वारा 10 अप्रैल 2023 को उन्हें सम्मानित भी किया गया।
उद्यमी मनीष पाटिल ने कहा कि लोग सस्ती कीमत पर ई-वाहन खरीद सकें, इस दिशा में कदम उठाया गया है, ताकि आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण मुक्त वातावरण मिले और ई-वाहन छात्रों, गृहिणियों और लोगों के दैनिक जीवन में उपयोगी हो सकें। इसके लिए वे ट्रेनिंग के लिए विदेश भी गए थे। आज भारत के विभिन्न राज्यों में 20 से अधिक आउटलेट्स पर इलेक्ट्रो इको ई-बाइक बेची जा रही हैं। 5 हजार से अधिक संतुष्ट ग्राहकों का बड़ा आधार होने पर उन्हें गर्व है। प्रारंभ में, ई-वाहनों के दो मॉडल लॉन्च किए गए थे, लेकिन लोगों की मांग बढ़ने के बाद, स्कूटर, बाइक, कार और वाणिज्यिक वाहन पिक-अप की श्रेणियों में ई-वाहनों के 12 मॉडलों को मंजूरी दी गई और चरणों में उन्हें लॉन्च किया गया। केंद्र सरकार ने 30 हजार ई-वाहन बनाने की इजाजत दे दी है। साल 2024 तक इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पाली करमबेली उमरगाम में तीन से पांच एकड़ जमीन पर एक लाख वर्ग फुट का प्लांट बनाया जाएगा, जहां सालाना 10 हजार से 15 हजार ई-वाहन बनाए जाएंगे। जहां पर 300 से 400 लोगों को रोजगार मिलेगा और 600 करोड़ रुपए का टर्नओवर का अनुमान है। यहां पर विदेशी कंपनियों की इलेक्ट्रिक कारों की तुलना में पांच सीटर कारों का भी निर्माण किया जाएगा। हालांकि, फिलहाल 3-सीटर कार लॉन्च की गई है।
 ‘वाइब्रेंट वलसाड’ कार्यक्रम ने वापी के ई-वाहन उद्योग को बढ़ावा दिया:–
“लोकल फॉर वोकल” के बजाय “लोकल फॉर ग्लोबल” के आदर्श वाक्य को आगे बढ़ाने के लिए वापी में बने ई-वाहनों को यूरोपीय देशों में भी निर्यात करने की मंजूरी मिल गई है। वहीं अब “मेक इन इंडिया” का ब्रांड विदेशों में भी पहुंचेगा। अब ई-वाहन ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में गुजरात एक्सपोर्ट हब बनेगा। हाल ही में गुजरात सरकार द्वारा वापी में आयोजित ‘वाइब्रेंट वलसाड से भी इस उद्योग को बढ़ावा मिला है। जिसके लिए मनीषभाई ने गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल का आभार प्रकट किया।
ई-वाहनों के उपयोग से पर्यावरण बचाने के साथ-साथ पैसे भी बचाने में मदद मिलती है:— मनीष पाटिल
प्रति माह 100 ई-वाहन बनाने से शुरुआत की गई, वर्तमान में प्रति माह 200 से 300 वाहन बनाए जा रहे हैं। सालाना 3000 से 4000 ई-वाहनों का उत्पादन हो रहा है। अब तक 5000 से 7000 ई-वाहनों का निर्माण भी किया जा चुका है। इसके अलावा गुजरात सरकार द्वारा 12 हजार रुपए की सब्सिडी भी 700 विद्यार्थियों को दी गई है। वहीं 50 किमी से 200 किमी तक के ई-वाहन बनाये जा रहे हैं। जिसमें स्कूटर 70 हजार रुपये, बाइक डेढ़ लाख रुपए और कार 3 लाख रुपए से लेकर 5 लाख रुपए कीमत तक के वाहनों का निर्माण किया जा रहा है। पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में ई-वाहन न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं बल्कि पेट्रोल-डीजल की लागत भी बचाते हैं। ई-वाहन महज डेढ़ से दो साल में पैसा वसूल हो जाता है।

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